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छह महीने पहले मैंने IIT BHU में अपनी सीट छोड़ दी थी — ताकि गाँव में रहकर दादाजी की सेवा कर सकूँ। पिछले हफ्ते उन्होंने खुद मुझे बस अड्डे तक छोड़ा और बोले: "जा बेटा, पढ़। मैं सँभाल लूँगा।" मेरा नाम अर्जुन है। उम्र 22 साल। मैं — ठीक से कहूँ तो — ज़िन्दगी भर एक गाँव में रहा हूँ, वाराणसी से कोई 40 किलोमीटर दूर, दादाजी रामप्रसाद के साथ। उन्होंने मुझे पाला है। न माँ ने, न बापू ने — दादाजी ने। माँ मुंबई चली गई थीं जब मैं चार साल का था। किसी के घर में काम करने। पहले फ़ोन आता था दीवाली पर, फिर कम होता गया, फिर बंद। बापू को तो मैंने कभी जाना ही नहीं। पाला दादाजी रामप्रसाद ने — गाँव के खेतों में ज़िन्दगी भर हल चलाने वाले आदमी, हाथ फ़ावड़े जैसे, आवाज़ बैल जैसी गहरी। स्कूल हाथ पकड़कर ले जाते, होमवर्क चेक करते — भले खुद पाँचवीं तक पढ़े थे — शनिवार को दाल-चावल बनाते और कहते: "अर्जुन बेटा, पढ़। मेरी तरह पीठ मत तोड़ना खेतों में।" मैंने पढ़ाई की। वाराणसी के एक सरकारी स्कूल से बारहवीं में डिस्ट्रिक्ट टॉप किया। JEE में रैंक आई और IIT BHU में एडमिशन हुआ — मैकेनिकल इंजीनियरिंग। हमारे गाँव से बीस साल में पहला लड़का जिसने IIT में सीट पाई। पूरे गाँव ने मिठाई बाँटी। और IIT जाने से दो हफ़्ते पहले दादाजी आँगन में गिर गए। मैंने उन्हें लकड़ियों के पास पाया। उठ नहीं पा रहे थे। फिसले नहीं थे — घुटनों ने जवाब दे दिया था। मैंने उठाया — अस्सी किलो — अन्दर लाया, और वो रो रहे थे। ज़िन्दगी में पहली बार दादाजी को रोते देखा। दर्द से नहीं। शर्म से। "माफ़ कर बेटा। माफ़ कर।" दादाजी के घुटने दस-बारह साल से दुख रहे थे। वो हमेशा टाल देते — "मैं रामप्रसाद हूँ, बेटा, मुझे साँड ने नहीं गिराया तो घुटना क्या गिराएगा?" ज़िला अस्पताल में एक्स-रे हुआ। डॉक्टर — एक थकी हुई महिला, सीधी बात करने वाली — ने कहा: — ऑस्टियोआर्थराइटिस, ग्रेड 3। दोनों घुटने। कार्टिलेज घिस चुका है। नी रिप्लेसमेंट करवाना होगा, वरना एक साल में व्हीलचेयर। मैंने पूछा — कितना ख़र्चा, कितना वक़्त? सरकारी अस्पताल में वेटिंग लिस्ट — ढाई-तीन साल। प्राइवेट में — एक घुटने का डेढ़ लाख, दोनों का तीन लाख। दादाजी की पेंशन — तीन हज़ार रुपये महीना। वृद्धावस्था पेंशन। मेरी — स्कॉलरशिप, जो अभी शुरू भी नहीं हुई थी। तीन लाख न हमारे पास थे, न हो सकते थे। मैं सोच सकता थ